| Topic : India-Pakistan Talks: Will there be any progress? |
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Primetime News
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Source : http://in.jagran.yahoo.com
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last activity : 02 10 2011 09:05:41 +0000
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The following article of mine on Indo-Pak talks in Thimpu was published by Dainik Jagran on its edit page today.
बातचीत के उलझे समीकरण
रविवार को भूटान की राजधानी थिंपू में भारत-पाक सचिव वार्ता का नतीजा मिला-जुला रहा। अच्छी-बुरी दोनों तरह की खबरें मिली हैं। बुरी खबर यह है कि भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव और उनके पाक समकक्ष सलमान बशीर पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के भारत दौरे की तिथि भी तय नहीं कर पाए। माना जा रहा है कि कुरैशी 2011 की पहली तिमाही के अंत तक भारत यात्रा पर आएंगे। थिंपू वार्ता में कुरैशी की भारत यात्रा की तिथियां निर्धारित करने का अच्छा मौका था, जो दोनों विदेश सचिवों ने गंवा दिया। इससे संकेत मिलता है कि दोनों पक्षों में अहम मुद्दों पर मूलभूत मतभेद हैं। एक और बुरी खबर यह है कि दोनों देशों के विदेश सचिव व्यापार, सर क्रीक जैसे कम महत्व के मुद्दों पर व्यापक कार्ययोजना तैयार नहीं कर पाए हैं, जबकि इस वार्ता में इसकी उम्मीद की जा रही थी। उनसे इस बात पर सहमति की भी उम्मीद जताई जा रही थी कि आतंकवाद के मुद्दे पर गृह सचिवों की पृथक वार्ता के अलावा वाणिज्य, संस्कृति और जल संसाधन के मसले पर अलग से वार्ताओं की रूपरेखा तैयार की जाएगी। अच्छी खबर यह है कि दोनों विदेश सचिवों ने परिपक्वता का परिचय देते हुए पृथक प्रेस वार्ताओं में काफी संयमित व्यवहार किया। राव-बशीर वार्ता से प्रवाहित उत्साहवर्द्धक कूटनीतिक प्रतीकात्मकता में जटिल मसलों पर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तमाम मुद्दों पर समान सुर में बात की गई। राव ने मुंबई आतंकी हमलों की जांच में पाकिस्तान की ढिलाई संबंधी सवालों का संयमित जवाब दिया। इसी तरह बशीर ने पाकिस्तान जा रही समझौता एक्सप्रेस में 17 फरवरी, 2007 को पानीपत के पास हुए विस्फोट के मुद्दे पर भारत की भूमिका पर कीचड़ उछालने से परहेज किया। इस विस्फोट में 68 लोग मारे गए थे, जिनमें 42 पाकिस्तानी थे। यह एक अच्छा संकेत है। यह तीन बार सीधा युद्ध लड़ चुके दो परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसियों के संबंधों के सामान्यीकरण की दिशा में पहलकदमी है। दोनों पक्षों को बातचीत जारी रखने और मीडिया के माध्यम से मोलभाव की प्रवृत्ति पर अंकुश रखने की आवश्यकता है। अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा शिखर सम्मेलन की विफलता इसका जीता-जागता प्रमाण है कि भारत और पाकिस्तान को किस प्रकार द्विपक्षीय संबंधों में आचरण नहीं करना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के इतना करीब होते हुए भी इतना दूर होने के कारणों में द्विपक्षीय वार्ताओं में प्रदर्शित नजरिये में मूल अंतर भी शामिल है। पाकिस्तान की नीति शिखर से सतह की ओर जाने की है। यानी वह सबसे पहले कश्मीर के मुद्दे को हल करना चाहता है और बाद में अन्य मुद्दों को। भारत की नीति सतह से शीर्ष है। भारत इस बात पर जोर देता है कि पहले पाकिस्तान सर क्रीक, व्यापार और व्यक्ति का व्यक्ति से संपर्क जैसे मुद्दों को पहले सुलझाए और बाद में जटिल मुद्दों का हल निकालने का प्रयास करे। इसी कारण अनेक अवसरों पर द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत और पाकिस्तान अलग-अलग धरातल पर खड़े नजर आते हैं। यह अजीब लगता है, किंतु है बिल्कुल सच कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सबसे अधिक प्रगति जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में हुई, जो कारगिल युद्ध के प्रमुख सूत्रधार थे। उनके शासनकाल में ही भारत और पाकिस्तान महत्वपूर्ण विश्वास निर्माण उपायों (सीबीएम) पर राजी हुए थे। दोनों देशों के बीच श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा की शुरुआत या फिर आतंक विरोधी तंत्र की स्थापना हुई, जिसके तहत दोनों पक्षों की खुफिया एजेंसियों की वार्ताओं आयोजित की गईं। ये प्रयास बाद में विफल हो गए थे। मुशर्रफ के कार्यकाल में सीबीएम में सबसे महत्वपूर्ण कदम दोनों देशों की सीमाओं पर सीज फायर संबंधी था। कुछ छोटे-मोटे उल्लंघनों को छोड़कर यह सीबीएम छह साल के बाद अब तक भी जारी है। यही नहीं, नियंत्रण रेखा पर आने-जाने के छह मार्ग भी मुशर्रफ के शासनकाल में ही खुले थे। यह प्रगति इस तथ्य के बावजूद हुई कि अपने पूरे कार्यकाल के दौरान मुशर्रफ कश्मीर के मुद्दे पर जरा भी शिथिल नहीं पड़े। पाकिस्तान कभी भी भारत को यह नहीं बता पाया कि वह आखिर चाहता क्या है? पाकिस्तान बस कश्मीरियों की भावनाओं की कद्र करने का राग अलापता रहा है। यही नहीं, मुशर्रफ के कार्यकाल में ही भारत और पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर भी समझौते के करीब पहुंच गए थे, किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका था। निकट भविष्य में भारत-पाकिस्तान विवाद हल होने की संभावना दूर की कौड़ी है। जब भी दोनों पक्ष मिलते हैं तो वे असहमति पर ही सहमत होते हैं। वे पत्तियों पर पानी छिड़कते हैं और जड़ को सूखी छोड़ देते हैं। जब तक पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन नहीं आता, भारत पाकिस्तान के बीच रिश्ते पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकते। भारत विरोधवाद पाकिस्तान के नागरिक और सैन्य प्रतिष्ठान की डीएनए संरचना है। इसे भारत नहीं बदल सकता। (

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