| Topic : aaj ki bakwas |
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Source : http://ilusameerji.blogspot.com
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last activity : 07 06 2010 20:18:04 +0000
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मेरी मां को सौभाग्य से थोड़ा पढ़ने-लिखने का मौका मिल गया था. इसलिए अच्छी हिंदी पढ़-लिख और समझ लेती है. हिंदी साहित्य और हिंदी फिल्मों में भी मां की रूचि से मैं परिचित हूं. अपने छुटपन की कई कविता-कहानियां भी उसे अब तक याद हैं. ये बात भी मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूं कि वो आज भी पिता की तुलना में कहीं ज्यादा सटीक तरीके से किसी गूढ़ अर्थ वाली कविता का भावार्थ-प्रतिकार्थ समझ और समझा सकती है. व्याकरण और अलंकारों की भले ही ज्यादा समझ उसे न हो, लेकिन वो उम्दा और औसत साहित्य में बहुत अच्छी तरह फ़र्क कर सकती है. ये मां की ही परछाईं का असर है कि आज मैं भी इस क़ाबिल हूं कि हिंदी के किसी अपरिचित शब्द से पाला पड़ने पर भी मैं उसका उच्चारण करने में अटकता नहीं हूं. दूसरों की नज़र में क्लिष्ट और जटिल जान पड़ने वाले शब्द भी मुझे परेशान नहीं करते हैं. दूसरों को रिझाने लायक थोड़ा-बहुत लिख भी लेता हूं. मतलब, हिंदी से प्यार करना मुझे मां ने ही सिखाया. इसलिए मां कभी भी मम्मी या मॉम भी नहीं बन पाई. पर अब मन में कई बार ये सवाल पैदा होता है कि क्या मां पर समय और देशकाल का असर रहा होगा. पर इस सवाल का पक्का जवाब घंटों सर खपाने पर भी नहीं मिलता. अंग्रेज़ी तो तब भी थी. मां, शहर में ही पली-बढ़ी है. फिर भी उस पर अंग्रेज़ी का जादू क्यों नहीं चला? फिर मां कि उम्र बीस-पच्चीस साल घटाकर उसके बारे में सोचता हूं. सोचता हूं कि अगर वो आज के दौर में होती तो क्या हिंदी को लेकर उसकी दीवानगी ऐसी ही होती. तब, एक काल्पनिक रूप में मां सामने आकर खड़ी हो जाती है. मां के उस रूप को मॉम कहना ज्यादा उचित होगा. देखता हूं कि मॉम इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्स कर रही है. मेरे कॉन्वेंट स्कूल की पैरेन्ट्स मीटिंग में भद्द पिटने से बचने के लिए. टीवी सीरियल और फिल्मों के डायलॉग समझने के लिए. अपने एडवांस मोबाइल के फीचर्स सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए. इंटरनेट की कम्युनिटी और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर अपनी सखियों की खोज-ख़बर लेने के लिए. बाज़ार में टंगे होर्डिंग-बैनरों के ब्रांडेड विज्ञापनों के ऑफर समझने के लिए. दरवाजे पर रोज़ाना आने वाली सेल्सगर्ल्स के सामने मोलभाव करते हुए ऑक्वर्ड फील करने से बचने के लिए. इस बदले रूप में मां बड़ी अजीब लगती है. मॉम बनी मां के दिल में झांकने पर और भी ताज्जुब होता है. वो अब भी हिंदी के साथ कम्फर्टेबल फील करती है. मेरी हिंदी टीचर से ही वो खुलकर मेरे बारे में अपनी चिंता शेयर कर पाती है. गुलज़ार और प्रसून जोशी के लिखे टफ टाइप गाने भी वो सहजता से गुनगुनाती है. उसके एसएमएस, चैटिंग और स्क्रैप की लिपि भले ही रोमन हो, लेकिन भाषा अब भी हिंदी ही है. जिस ऑटो या रिक्शे पर चढ़कर वो बाज़ार जाती है, उसे चलाने वाला अब भी लेफ्ट और राइट टर्न का मतलब नहीं समझता है. वो अब भी अमेरिकन इंग्लिश में धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाले स्लैंग शब्दों को सुनकर झेंप जाती है. वो अब भी बड़ों को आप की जगह यू कह कर संबोधित करने में अटकती है. पर पता नहीं क्यों, मॉम ना तो अपने अंदर की हिंदी की छाया मुझ पर पड़ने देना चाहती है और ना ही इसकी भनक किसी और को लगने देना चाहती है.
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