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Topic : politics of india
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Primetime News

 
Industry : Publishing Functional Area : Politics
Keywords :

headley

rana

Activity:  2 comments  20 views  last activity : 06 18 2011 15:32:44 +0000
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दबाव बढ़ाने का सही समय

मुंबई आतंकी हमले में लिप्त होने के आरोप से तहव्वुर हुसैन राणा को बरी कर दिए जाने के शिकागो कोर्ट के निर्णय पर भारत उचित ही निराश है। फिर भी भारत के लिए सही यह होगा कि वह पाकिस्तान और अमेरिका पर इसके लिए दबाव बढ़ा दे कि 26/11 के नरसंहार की साजिश रचने वालों को दोहरी तेजी से कानून के घेरे में लाया जाए और इससे भी अधिक पाकिस्तान इस आतंकी हमले को दोहराने का दुस्साहस न कर सके। शिकागो की अदालत ने राणा के खिलाफ दो महत्वपूर्ण आरोपों को खारिज कर दिया है, जिनके संदर्भ में अभियोजकों ने पर्याप्त सबूत भी पेश किए थे। इन सबूतों से पता चलता है कि राणा ने मुंबई हमले की साजिश रचने के लिए डेविड हेडली को किस हद तक समर्थन दिया। पहला यह कि राणा ने हेडली की भारत यात्रा के लिए एयर टिकट खरीदे और दूसरे, राणा ने भारत और डेनमार्क की यात्रा के लिए आव्रजन अधिकारियों के समक्ष हेडली को अपने कर्मचारी के रूप में प्रस्तुत होने की छूट दी। यह विचित्र है कि ज्यूरी ने इन दो बिंदुओं की पूरी तरह अनदेखी कर दी। इससे भी अधिक विचित्र यह है कि जजों ने राणा को डेनमार्क में आतंकी हमला करने की साजिश रचने के लिए लश्करे तैयबा की मदद करने का दोषी पाया। इससे पता चलता है कि जज पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर के जिहादी ब्रांड के आतंकवाद को समझने में पूरी तरह असफल रहे। लश्कर ने ही मुंबई हमले की साजिश रची, उसे अंजाम दिया और उसकी निगरानी की। उसे इस काम में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ का पूरा सहयोग मिला। शिकागो की अदालत के इस फैसले को समझना मुश्किल है कि राणा की मुंबई हमले में कोई भूमिका नहीं थी, हालांकि उसने उस लश्कर को सहायता उपलब्ध कराई जिसने इतने बडे़ आतंकी हमले को अंजाम दिया। अमेरिकी अभियोजकों का इस फैसले के खिलाफ ऊंची अदालतों में अपील करना आवश्यक है, जबकि भारत को अमेरिका के साथ अपने कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक रिश्तों का फायदा उठाकर ओबामा प्रशासन पर इसके लिए दबाव डालना चाहिए कि वह जितनी जल्दी संभव हो, इस फैसले को चुनौती दे। भारत ने बमुश्किल पांच-छह दिन पहले अमेरिका के साथ दस सैन्य परिवहन विमानों की आपूर्ति के लिए 4.1 अरब डालर का सौदा किया है, जो 23000 अमेरिकियों को रोजगार प्रदान करेगा। भारत को अमेरिका के समक्ष यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि व्यापारिक संबंधों को राणा-हेडली जैसे मुद्दों से अलग नहीं रखा जा सकता, जो भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं। फिर भारत को क्या करना चाहिए? कम से कम दो ऐसे विकल्प हैं जिस पर भारतीय विदेश मंत्रालय चल सकता है और संकेत यह भी हैं कि मंत्रालय इन पर विचार कर रहा है। भारत राणा-हेडली प्रकरण और उनकी आइएसआइ के साथ मिलीभगत को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की आतंकवाद निगरानी समिति के समक्ष ले जाने पर विचार कर रहा है। इसके अतिरिक्त भारत अमेरिका को यह बताने पर भी विचार कर रहा है कि वह राणा-हेडली मामले तथा मुंबई हमले में आइएसआइ की भूमिका को उसी प्रकार ले जैसा उसने 1988 के लाकरबी मामले में लीबियाई खुफिया सेवा की भूमिका को लिया था। 9/11 की घटना के बाद पारित किए गए प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक देश का यह दायित्व है कि वह किसी अन्य देश में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए सहायता देने अथवा उनमें शामिल होने से दूर रहे। भारतीय कूटनीतिक प्रतिष्ठान को अमेरिका के समक्ष यह स्पष्ट करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए कि आइएसआइ ने मुंबई हमले के रूप में इस प्रस्ताव का उल्लंघन किया। नई दिल्ली की ऐसी कोई पहल अमेरिका को इसके लिए राजी करने में भी मददगार हो सकती है कि वह पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने वाला राष्ट्र घोषित करे। इन दो विकल्पों की राह में हालांकि दो कठिनाइयां भी हैं। पहली यह कि चीन आइएसआइ के खिलाफ कार्रवाई करने की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पहल पर वीटो कर देगा और दूसरी यह कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय इस मामले में भारत के साथ नहीं खड़ा होना चाहेगा। भारत ने पहले ही संकेत दे दिया है कि उसके पास राणा और हेडली के खिलाफ आरोपपत्र दायर करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। गृह मंत्रालय ने शिकागो की अदालत में अमेरिकी अभियोजकों द्वारा प्रस्तुत किए गए पांच सबूत भी मांगे हैं। मंत्रालय ने यह उल्लेख भी किया है कि जहां राणा के वकीलों ने फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है वहीं अभियोजन पक्ष की ओर से इस संदर्भ में कुछ नहीं कहा गया है। हेडली, राणा और अन्य के खिलाफ मामले की जांच करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने फिलहाल अभियुक्तों के खिलाफ भारत में आरोपपत्र दायर करने से पहले अमेरिका में इस मामले की कार्यवाही समाप्त होने तक इंतजार करने का फैसला किया है। एनआइए के समक्ष अब बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। उसे न केवल अमेरिकी अदालत के फैसले का अच्छी तरह अध्ययन करना है, बल्कि भारतीय अदालत में हेडली, राणा और अन्य के खिलाफ मुकदमा चलाने की तैयारी भी करनी है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

 

 

 

 

 

 
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2 comments on "WHAT RANA'S ACQUITTAL MEANS FOR INDIA"
  Commented by  Rohit Thakur, Sr. MEP QA/QC Engineer, QA/QC INCHARGE, CONSTRUCTION SPECIALIST-MEP    | 06 12 2011 07:46:34 +0000
I think we should continue put pressure on American govt. to hand over Rana and Headley to INDIA. If USA can enter pak and kill his culprit Osama then why cant us? thanks for sharing Mr. Sharma!
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