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निरूपमा का भूत ------------- निरूपमा की हत्या की गई या उसने खुदकुशी की, इस रहस्य से अभी पर्दा नहीं उठ पाया है. शायद इसमें अभी कुछ और वक्त लगेगा. लेकिन निरूपमा की मौत के बाद पैदा हुआ भूत हर विजातीय प्रेमी जोड़े को डराने ज़रूर लगा है. मॉडर्न ज़माने के जोड़े जिस जात-पांत की खाई को पुराने ज़माने की चीज़ मानकर भूल से गए थे, जिनकी दिलचस्पी अपने पार्टनर का दिल का हाल जानने में ज्यादा थी, अब अपने लव पार्टनर की जाति डिस्कवर करने के बाद से आतंक के साये में जीने लगे हैं. अख़बार और न्यूज़ चैनलों पर निरूपमा और प्रियभांशु की पुरानी मुस्कुराती तस्वीरों में इन जोड़ों को अपने अक्स की परछाइयां नज़र आने लगी हैं. सड़ी-गली सामाजिक संरचनाओं के बजाए व्यक्तित्व और वयक्तिगत आर्थिक दशा को तरजीह देने और प्रभावी मानने...
Trends: "निरूपमा का भूत" deleted from your view.
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Yes
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26
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No
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Jaygopal Raghavan
| Argues in support of
"No"
| 2 years ago
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Absolutely wrong. Branding is very mcuh crucial for success. Made in Japan itself was promoted vigourously and that in itself is branding. One can brand a product, service, human being, country et al. Sanjeev kappor the famous chef is a brand by...
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sameer ranjan
| Argues in support of
| 2 years ago
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मैं मीना की बात से सहमत हूं. ये बात बिल्कुल व्यवहारिक भी है. कंज्युमर को उत्पाद की गुणवत्ता से मतलब होता है, ना कि उसकी ब्रान्ड वैल्यू से. हो सकता है कि मेरी इस बात से कई लोग सहमत न हों, लेकिन ज्यादातर उपभोक्ताओं को एक न एक समय इस सच्चाई का एहसास...
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Purvi Ghosh
| Argues in support of
"No"
| 2 years ago
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Branding is very much required for success in business since it helps in promotion, i.e, making awareness of the product which is very much necessary and according to me branding is very crucial as it helps a product to be more popular and if the...
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Debate: "Branding is not crucial for success: do you agree?" deleted from your view.
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एक बार फिर मधु कोड़ा घोटाला मामले में भाजपा नेता और जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा सीट के पूर्व विधायक सरयू राय ने मीडिया के सामने बड़ा ख़ुलासा किया है. सरयू राय ने मीडिया को एक सत्रह मिनट लंबी एडिटेड ऑडियो सीडी जारी की है. सरयू राय का दावा है कि इस सीडी में मनोज पुनमिया की आवाज़ रिकॉर्ड की गई है. मनोज पुनमिया मधु कोड़ा घोटाला मामले में मुख्य अभियुक्त है. ये शख्स मूल रूप से मुम्बई का रहने वाला है और पेशे से सोनार है. पुनमिया से कोड़ा की पुरानी पहचान रही है. कोड़ा पहले भी गहने ख़रीदने के लिए इस शख्स से संपर्क साधते रहे हैं. सोमवार को जमशेदपुर में जारी की गई इस सीडी में कथित तौर पर मनोज पुनमिया की किसी बेनाम शख्स से साथ की गई बातचीत को रिकॉर्ड किया गया है. सीडी की ऑडियो क्वालिटी अच्छी नहीं है, लेकि...
Trends: "कोड़ा कांड में नया ख़ुलासा" deleted from your view.
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ममता दीदी के लिए इस बार रेल बजट पेश करते हुए बिहार को बिल्कुल से नज़रअंदाज़ करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी होगा. बिहार में चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, ऐसे में जाहिर तौर पर कांग#ेस आलाकमान ने ममता पर बिहार पर मेहरबान होने का दबाव बनाया होगा. वैसे बंगाल में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसलिए रेल बजट में बिहार औौर बंगाल पर होने वाली मेहरबानियों का राजनीतिक चश्मों से विशलेषण किया जाना तय है. इधर लालू अपना आजीवन रेल पास छिन जाने और जांच के चक#व्यूह में फंसाए जाने की वजह से ममता दीदी से पहले ही खार खाए बैठे हैं. इस बार भी अगर रेल बजट पेश करते हुए ममता और लालू के बीच की तीखी नोंक-झोंक देखने को मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. बिहार के मुख्यमंत#ी नीतीश कुमार पहले ही दीदी को ...
Trends: "माई नेम इज़ ममता, एंड आई एम अड़ियल" deleted from your view.
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कभी वो दबे-कुचलों का दर्द बन पत्रकारों के दिल में उठती थी...फिर कलम की स्याही के जरिए अख़बार के पन्नों पर अपनी जगह पक्की कर लेती थी. पर अब ख़बर में दर्द की गुंजाइश हो तो पत्रकार उस दर्द को दबा देता है. अब तो इलैक्ट्रॉनिक मीडिया भी है. कलम दर्द के बारे में लिखती नहीं और कैमरा दर्द को क़ैद करने से कतराता है. कुछ दिन पहले तक मीडिया कर्मियों के आगे बिकाऊ ख़बर बनाने की चुनौती हुआ करती थी. पर अब तो लगता है कि इस चुनौती का दायरा भी सिमट कर शून्य के क़रीब आ गया है. अब ख़बर के लिए जगह ही नहीं बची है, जहां वो खुलकर सांस ले सके. ख़बर की जगह ही बेच दी गई है. ख़बर आए भी तो भी उसके दिखने का परसेंटेज इस बात पर डिपेंड करता है कि पेड ख़बरों के बाद कोई स्लॉट बचा भी है या नहीं. ख़बर फिल्मों के प्रमोशनल प्रोग्र...
Trends: "ख़बर को बचाना है" deleted from your view.
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आज भी दिखे गनौरी, फेकना और गोंजी लेबर चौक पर अपने फावड़े के साथ सुबह-सुबह दिहाड़ी मिलने के इंतज़ार में पूजा पंडाल के पास बाज़ार में पहले खड़े थे, फिर थक कर बैठ गए काम ने उनसे छुट्टी ले रखी थी आज पगार के नाम पर ठेकेदार भी निकला दग़ाबाज़ दूर से भी नज़र आ रही थी प्रतिमा मां की एक-एक भाव-भंगिमा हाथ जोडे, शीष नवाते लोग छप्पन से भी ज्यादा तरह के भोग पर उनके मन को कैसे आता ये रास जब भीतर टूर रही हो आस शाम ढली को घर जाने की सुध आई पर खड़े हुए तो टांगें लड़खड़ाईं कुछ भवें नफरत से तनीं तो कुछ आंखें बेवड़ा समझ बनीं तब, इन नासमझ नज़रों से नज़र फेर उनकी आंखों से निकले आंसू ज़मीन पर ही हो गए कहीं ढेर
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varsha
| Commented
| 2 years ago
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very nice and core words to the real situations of life.. thanks
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Insight: "हाशिए की पूजा" deleted from your view.
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इस साल क्या है, भइया? हर साल की तरह इस बार फिर दुर्गापूजा से ठीक पहले इस सवाल ने मेरे भीतर उधम मचाना शुरू कर दिया है. बचपन का बड़ा हिस्सा बंगाल के एक छोटे से शहर में बीता है. सो अब भी दुर्गापूजा का ज़िक्र आने पर वहां का सामुदायिक भवन और उसमें स्थापित होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा आंखों के आगे तैरने लगती है. पर मेरे मालगुड़ी टाइप के इस शहर की दुर्गापूजा को याद रखने की दूसरी कई वजहें भी हैं. ऐसी ही एक वजह हैं, मलय दा. मलय दा, द पेंटर. पतली-दुबली कदकाठी + पावर लेंस वाले चश्मे से ढंकी आंखें + खिचड़ी बाल + अधपकी दाढ़ी + बेतरतीब सा पहनावा = मलय दा का हुलिया. पर दादा की सबसे पक्की पहचान है, उनके चेहरे पर हरदम मौजूद रहने वाला दार्शनिकों वाला एक्सप्रेशन. मेरे मालगुड़ी में मलय दा और दुर्गापूजा को ए...
Insight: ""एई बोछेर कि आछे दादा"" deleted from your view.
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हम और आप आम हैं. इम्तियाज अली की भाषा में मैंगो पीपुल. मेरा बस चले तो संविधान की प्रस्तावना की स्टार्टिंग लाइन के ' वी द पीपुल' में भी संशोधन करके इसे ' वी द मैंगो पीपुल' में बदल दूं. लेकिन ऐसा करने के लिए मुझे आम से ख़ास होना पड़ेगा. और अगर भूल-चूक से एक बार मैं ख़ास बन गया, तो फिर भला मैं आम की परवाह क्यों करूंगा. संविधान से छेड़-छाड़ तो फिर भी की जा सकती है, लेकिन राजनीति की मूल अवधारणा से छेड़खानी करना मेरे बस का नहीं है. एक बार गांधी बाबा ने ऐसा अटैम्पट लिया था. धर्म और राजनीति को जोड़कर एक सेनटेन्स कहा था. लेकिन ख़ास लोगों ने इस सेनटेन्स की ऐसी बखिया उधेड़ी कि आम के दिमाग का मैंगो शेक बन गया. अभी सुना कि कांग्रेस आलाकमान ने अपने मंत्रियों से खर्च में कटौती करने को कहा है. आलाकमान और क...
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Ajay Ziz
| Commented
| 2 years ago
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sameer sahib where were you sleeping till now :: munshi prem chand ka kuch post kariye :: eer , bheer , fateh , teer by harivansh rai bachan and others mahua style mein
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Trends: "राजनीति पर रैबिज का ख़तरा" deleted from your view.
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There is an ugly drama that is unfolding in Bangalore where top telecom provider is being taken to courts by a Techie who had been arrested due to the wrong information provided by Airtel, and is now sueing Airtel for Rs. 20 crores. Airtel had given wrong information to the police which forced the techie to go to jail. He spent 50 days in jail. and said that they were the most horrible days and said that one can't measure the trauma which I went through, my family went through he says Lakshman Kailash, a 28 year old engineer to CNN-IBN. Kailash who was a successful software engineer with HCL and was working in Bangalore. Two years ago, a Police team from pune had arrested him for 'defaming...
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Abdul Raheem.Syed
| Commented
| 2 years ago
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I still wonder how the private sector firms like AirTel can be that careless while providing the sensitive information. This is an eye opener for AirTel and other private bodies. Amount is not important here; for that matter, the amount is still...
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sameer ranjan
| Commented
| 2 years ago
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nice story. it's showcase of consumer power
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Vinod B Kanna
| Commented
| 2 years ago
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I agree with everyone.. Airtel should give the compensation, because of Airtel police has captured the wrong person.
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Trends: "Techie sues Airtel for Rs. 20 Crores" deleted from your view.
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May you live in interesting times is often referred to euphemistically as the Chinese curse . 2009, the year of the “OX” marked varied changes in many industries thus displacing the general normal ro...
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Akhilesh S Joshi
| Answered
| 2 years ago
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I believe that there are ample reasons to continue in industry by the advertisers. The recession, rains, weak crop, drought seems to be least important as India is such a vast area for brand owners to consume their product among the consumers....
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sameer ranjan
| Answered
| 2 years ago
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it will take some more time. but i think after mid of coming year change will take the pace. advertisers have a few reasons 2 worry. rain has came again. and it will mend the loss of kharif paddy. and we r hoping 4 ample rabi paddy. due to these...
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Answer: "How do advertisers see the advent of the year 2010?" deleted from your view.




