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Topic : aaj ki bakwas
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Industry : Radio, TV & Films Functional Area : India
Activity:  0 comments  226 views  last activity : 07 06 2010 20:18:04 +0000
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निरूपमा का भूत
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निरूपमा की हत्या की गई या उसने खुदकुशी की, इस रहस्य से अभी पर्दा नहीं उठ पाया है. शायद इसमें अभी कुछ और वक्त लगेगा. लेकिन निरूपमा की मौत के बाद पैदा हुआ भूत हर विजातीय प्रेमी जोड़े को डराने ज़रूर लगा है. मॉडर्न ज़माने के जोड़े जिस जात-पांत की खाई को पुराने ज़माने की चीज़ मानकर भूल से गए थे, जिनकी दिलचस्पी अपने पार्टनर का दिल का हाल जानने में ज्यादा थी, अब अपने लव पार्टनर की जाति डिस्कवर करने के बाद से आतंक के साये में जीने लगे हैं. अख़बार और न्यूज़ चैनलों पर निरूपमा और प्रियभांशु की पुरानी मुस्कुराती तस्वीरों में इन जोड़ों को अपने अक्स की परछाइयां नज़र आने लगी हैं. सड़ी-गली सामाजिक संरचनाओं के बजाए व्यक्तित्व और वयक्तिगत आर्थिक दशा को तरजीह देने और प्रभावी मानने वाला युवा वर्ग निरूपमा की मौत के बाद से सकते में हैं. उसे अपने पढ़े-लिखे मां-बाप भी संकीर्ण मानसिकता वाले जल्लाद सरीख़े नज़र आने लगे हैं. बेटे या बेटी की पसंद के ख़िलाफ जाकर मोटा दान-दहेज देकर स्वजातीय शादियां करवाने वाले मां-बाप का हठ इन युवाओं के लिए अबूझ पहेली बन गया है. मैनेजमेंट, साइंस या मैथमैटिक्स का कोई भी किताबी फॉर्मूला इस पहेली को सुलझाने में मददगार साबित नहीं हो रहा है. निरूपमा के पिता को टीवी स्क्रीन पर बेटी की मौत पर गमज़दा होने के बजाए सनातन धर्म के उपदेशों की बखिया उधेड़ते देखना, देश के युवाओं के लिए किसी हॉरर फिल्म को देखने के बाद होने वाले एहसास की तरह है. ख़ैर, मां-बाप और प्रेमी की बात छोड़िए, यहां तो कानून की रखवाली पुलिस और पोस्टमार्टम करने वाले सरकारी अस्पताल के कर्मचारी भी विलेन की भूमिका में नज़र आ रहे हैं. क़ानून पर भरोसा तो है, लेकिन समाज के धिनौने जर्म्स पहले भी जता चुके हैं कि उन्हें कानून की परवाह नहीं. हरियाणा की खाप जमात पहले भी कत्लेआम कर चुकी है और आगे के लिए आए दिन धमकाती भी रहती हैं. नेता और उनकी पार्टियां भी अगर वोट बैंक लूटने के चक्कर में इस खाप पंचायत के साथ प्यार की मांडवाली कर लें, तो कोई ताज्जुब नहीं होगा.
भूत भी दो मिजाज़ के होते हैं. अच्छे और बुरे. उम्मीद है अधूरे प्यार का दर्द लिए दुनिया से रूख्सत हुई निरूपमा का भूत अपनी अच्छाई के डर से सबको डराने में ज़रूर कामयाब होगा. एक शीतल पेय के विज्ञापन की पंच लाइन यहां लिखनी रेलीवेंट लगती है- क्योंकि डर आगे जीत है.

 
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