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Topic : aaj ki bakwas
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Industry : Radio, TV & Films Functional Area : India
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Activity:  1 comments  252 views  last activity : 07 06 2010 20:18:04 +0000
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कभी वो दबे-कुचलों का दर्द बन पत्रकारों के दिल में उठती थी...फिर कलम की स्याही के जरिए अख़बार के पन्नों पर अपनी जगह पक्की कर लेती थी. पर अब ख़बर में दर्द की गुंजाइश हो तो पत्रकार उस दर्द को दबा देता है. अब तो इलैक्ट्रॉनिक मीडिया भी है. कलम दर्द के बारे में लिखती नहीं और कैमरा दर्द को क़ैद करने से कतराता है. कुछ दिन पहले तक मीडिया कर्मियों के आगे बिकाऊ ख़बर बनाने की चुनौती हुआ करती थी. पर अब तो लगता है कि इस चुनौती का दायरा भी सिमट कर शून्य के क़रीब आ गया है. अब ख़बर के लिए जगह ही नहीं बची है, जहां वो खुलकर सांस ले सके. ख़बर की जगह ही बेच दी गई है. ख़बर आए भी तो भी उसके दिखने का परसेंटेज इस बात पर डिपेंड करता है कि पेड ख़बरों के बाद कोई स्लॉट बचा भी है या नहीं. ख़बर फिल्मों के प्रमोशनल प्रोग्राम के भार तले दब जाती है. या फिर तगड़ी टीआरपी बटोरने वाले टीवी सिरीयल की क्लिपिंग्स उसका क़त्ल कर देती हैं. ख़बर का काम तमाम करने का ठेका भूत-पिशाच अब भी ले रहे हैं. इंट'रनेट' पर जारी होने वाली वीडियो क्लिपिंग्स भी देश के ज्वलंत मुद्दों पर भारी पड़ने लगी हैं. बुलेटिन ऐसा है कि हेडलाइन के बाद ही ख़त्म हो जाता है. ब्रेकिंग होते-होते ही ख़बर बिखर जाती है. जब ख़बर का ही गला नप गया हो, तो फॉलोअप की तो बात ही बेईमानी है. कोई गहराई में नहीं जाना चाहता. गहराई नापने की आदत भी तो नहीं रही. किसी ने अगर भूल से नाप भी लिया तो दूसरे उसे कॉपी करने में कतई देर नहीं करते. वो भी तब, जब पास में दिखाने या छापने के लिए कुछ दूसरा मसालेदार या रेडिमेड प्रमोशनल आइटम न हो. मंदी का तो बहाना है. चुनाव में इनकी कितनी बंपर आमदनी हुई है, ये किसी से छिपा नहीं है. फिर भी छंटनी इसलिए क्योंकि जब माल तैयार ही नहीं करना तो फिर फालतू में उसे बनाने वालों का खर्चा क्यों उठाना. इनकी स्क्रिप्ट' या रिपोर्ट' में भले ही बताया गया हो कि भारत विविधताओं का देश है...विकसित होते इस देश की जनता के आगे अब भी कई जनसमस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं. पर इस ख़बर के भीतर क्या होगा वो आपको बताने की ज़रूरत नहीं. इसमें किसी राजनेता का प्रोजेक्टेड बयान होगा...या फिर किसी एनजीओ या सोसलाइट के कारनामों का पेड ज़िक्र. कुल मिलाकर मीडिया ख़बरों का गला तो घोंट ही रहा है...उसने इसे अल्पायु यानि कि ख़बरों की उम्र भी कम कर दी है. अब ख़बर इंटरनेट के भरोसे है. पर यहां की व्यापकता ही ख़बर का साइज़ घटा देती है. लेकिन फिर भी ख़बर यहां ज़िंदा रख सकती है. शर्त ये है कि आप और हम जैसे लोग, जो कि ख़बर की तबियत में सुधार चाहते हैं. इसका हाल-चाल लेते रहें. इसे अपनी राय का तोहफा देते रहें. और हां, इसे बाज़ार की आबो-हवा से बचाकर पैदा भी करें...और पाल-पोस कर बड़ा भी करते रहें. आमीन!
 
1 comments on "ख़बर को बचाना है"
  Commented by  manju dagar, News Anchor/TV Presenter, Time Today    | 12 25 2009 06:18:58 +0000
Nice one...............We will do some thing for this................
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